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मैं ” पुरुष ” हूँ…मैं भी घुटता हूँ , पिसता हूँटूटता हूँ , बिखरता हूँभीतर ही भीतररो नही पाताकह नही पातापत्थर हो चुकातरस जाता हूँ पिघलने कोक्योंकि मैं पुरुष हूँ…मैं भी सताया जाता हूँजला दिया जाता हूँउस दहेज की आग मेंजो कभी मांगा ही नही थास्वाह कर दिया जाता हैंमेरे उस मान-सम्मान कातिनका – तिनकाकमाया था जिसे मैंनेमगर आह नही भर सकता क्योकि मैं पुरुष हूँ…मैं भी देता हूँ आहुतिविवाह की अग्नि मेंअपने रिश्तों कीहमेशा धकेल दिया जाता हूंरिश्तों का वजन बांध करजिम्मेदारियों के उस कुँए मेंजिसे भरा नही जा सकतामेरे अंत तक कभीकभी अपना दर्द बता नही सकताकिसी भी तरह जता नही सकताबहुत मजबूत होने काठप्पा लगाए जीता हूँक्योंकि मैं पुरुष हूँ…हॉ.. मेरा भी होता है बलात्कारउठा दिए जाते हैमुझ पर कई हाथबिना वजह जानेबिना बात की तह नापेलगा दिया जाता हैसलाखों के पीछे कई धाराओं मेंक्योंकि मैं पुरुष हूँ…सुना है जब मन भरता हैतब आंखों से बहता हैमर्द होकर रोता हैमर्द को दर्द कब होता हैटूट जाता है तब मन सेआंखों का वो रिश्तातब हर कोई कहता है..तो सुनो …सही गलत कोहर स्त्री स्वेत स्वर्ण नही होतीन ही हर पुरुष स्याह कालिखमुझे सही गलत कहने वालोंपहले मेरी हालात नही जांचते …

क्योंकि…मैं “पुरुष” हूँ….?..

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