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A critic story on maintenance law ——पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाने वाले का, क्या पेड़ के फल पर हक होता है?एक बार एक किसान पति-पत्नी ने एक आम का बाग लगाया यह सोचकर कि बुढ़ापे में इसकी छांव में रहेंगे और बाग की आमदनी से उनकी परवरिश हो जाएगी। दोनों किसान पति-पत्नी ने कई साल तक अपना सबकुछ उस बाग को बड़ा करने लगा दिया। जब बाग बड़ा हो गया तो उसकी देखभाल के लिए उन्होंने एक औरत को साथ में रख लिया कि सब लोग इस बाग की देखरेख करेंगे तो बाग हरा भरा और फलदार रहेगा। इसके लिए उन्होंने उस औरत से इकरारनामा भी कर लिया। लेकिन अब औरत ने देखा कि इस बाग में फल अच्छे आते हैं तो सारे फल व पूरी बाग पर अपना अधिकार बताने लगी। कहने लगी कि बूढ़े किसान को पेड़ पालने की तमीजनही है बल्कि ये बूढ़े किसान पेड़ के लिए बोझ हैं। बूढ़े किसान पति-पत्नी यदि बाग की छांव में बैठते तो उन्हें खरी खोटी सुनाती। उस औरत के मायके वाले भी धीरे-धीरे पेड़ की लकड़ियां काट कर अपने घर ले जाने लगे। औरत बाग को कभी पानी न देती, न खाद डालती। धीरे-धीरे बाग के पेड़ मुरझाने लगे। फलों की संख्या कम हो गई। लेकिन इस औरत को सिर्फ कमाई चाहिए थीवह भी ज्यादा और बिना मेहनत करे। इसके लिए औरत व उसके परिवार वालों ने योजना बनाई कि क्यों न पेड़ को “नालायक और बेकार” बताकर उसे काट लिया जाय। अगले दिन औरत और उसके मायके वाले कुल्हाड़ी लेकर बाग पहुंचे और पेड़ को गाली देते हुए उसके तने पर वार करने लगे। बूढ़े किसान पति-पत्नी ने औरत व उसके मायके वालों को वार करने से रोका तो उन पर इन लोगों ने वार किया। यह देख बूढ़े पति पत्नी ने भागकर और घर-घर जाकर लोगों से मदद मांगी तब जाकर पेड़ तथा इन पति पत्नी को बचाने के लिए दो-दो लोग सामने आये और इस तरह पेड़ कटने से बचा। बूढे किसान पति-पत्नी से फिर से उस बाग को काफी मन लगाकर सींचा जिससे पेड़ पर फिर से फल लगने लगे। लेकिन अब उस औरत को फिर से उस बाग के पेड़ के फल चाहिए जिसपर उसने कुल्हाड़ी चलाई थी़ ? क्या उसे बाग के फल मिलने चाहिए ? शायद आपका जवाब होगा – नही । लेकिन हमारी अदालतों का जवाब “हॉ” होता है और पहला हक भी उसकी औरत का होता है। अदालत यह मानती है कि वह औरत बेचारी है। सेवा न करना उसका अधिकार है और औरत के जीवन यापन की जिम्मेदारी उस पेड़ की है जिसने उस औरत को सहारा देने का वादा किया था, न कि उसके मायके वालों की जिन्होंने उस औरत को जन्म दिया था। औरत चाहे पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाये यह उसका अधिकार है, पेड़ की तकलीफ सुनने वाला कोई नहीं है। पेड़ अगर कुल्हाड़ी के वार से बच जाये तो भी मायके में बैठे रहते हुए बिना सेवा किये उस पेड़ के फल पर उस औरत का अधिकार है। मौजूदा सरकार पेड़ के कम से कम 40 प्रतिशत फल इस औरत को देने का कानून लाने जा रही है। अब तक तो आप हमारी बात समझ गये होंगे -पेड़ – अर्थात वह पति जिसे बोलने का अधिकार नहीं है, सिर्फ उसके फल पर सबकी निगाह होती है। जब यह पेड़/पति अपने ऊपर चलने वाली कुल्हाड़ी अर्थात् 498ए, घरेलू हिंसा आदि धाराओं में दो-दो जमानतदारों की वजह से बचता है और बाद में अपने आप को संभालता है तो झूठा आरोप लगाने वाली महिला का उस बाग/पति की आमदनी पर कैसे हक हो सकता है, जिसमें औरत/पत्नी का कोई सहयोग न हो। सार – पत्नी और उसका परिवार अच्छी तरह से जानता है कि महिला कानूनों में पति व उसके परिवार को कम से कम तीन वर्ष की सजा होगी। अर्थात पति जेल में होगा। इस हिसाब से, तीन साल तक या जब तक दोष सिद्ध नही होता है तब तक जेल में जो पति की आमदनी होती है, लगभग 30 से 75 रूपया प्रतिदिन, होती उसी में से पत्नी को गुजारा मिलना चाहिए न कि पति की उस आमदनी पर, जो कि पति अपने जमानतदारों की मदद से बाहर आकर और अपनी मेहनत से, बिना पत्नी के सहयोग से, करता है। लेकिन अफसोस आज भी न्यायालय को सिर्फ औरत की तकलीफ और कुल्हाड़ी की चिंता है। पेड़ और पेड़ के तने पर कुल्हाड़ी से लगे घाव/अपमान की चिंता नहीं है और उन बूढ़े किसान/माता पिता के दर्द की भी कोई चिंता नहीं है जो कि बेटे के जेल जाने के बाद ये लोग झूठे आरोपों के अपमान के साथ बिना पैसे के कैसे जियेंगे। इन्हें सिर्फ औरत की चिंता है।सन् 2013 में 65000 पतियों ने आत्महत्या की। यदि इतनी ही संख्या में वास्तव में कोई सच में पेड़/व़क्ष काटता तो अब तक पर्यावरण विभाग न जाने कितना तहलका कर देता ?लेकिन पति/पुरूष की पीड़ा सुनने वाला कोई विभाग/आयोग नहीं है और अब कानून भी लिंग भेद पर आधारित बनने लगे हैं, जुर्म पर नहीं।

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